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स्मार्टफोन ही लोगों के लिए बैंक बनता जा रहा है.

इनफ़ोसिस और आधार प्रोग्राम के पूर्व प्रमुख नंदन नीलेकणि ने हाल ही में कहा है कि अब बैंकिंग के लिए मोबाइल ही इस्तेमाल किया जाएगा और टेक्नोलॉजी के इस बदलाव की मार कई बैंकों पर पड़ सकती है.

जैसे-जैसे बैंकिंग मोबाइल हो रही है, लेन-देन की औसत वैल्यू कम होती जा रही है. मिसाल के तौर पर 100 रुपए से कम के पेमेंट भी लोग मोबाइल से करने लगे हैं.

एक चेक की औसत वैल्यू अभी 75000 रुपए है, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक वॉलेट से लोग खुदरा ख़र्च कर रहे हैं.

इससे बैंकों की कमाई पर मार पड़ रही है, लेकिन इसका फायदा ये है कि छोटी से छोटी बचत वाले को भी अब कंपनियां अपने मोबाइल बैंकिंग के ग्राहक बना सकती हैं.

पे-टीएम और फ़्रीचार्ज जैसी कई मोबाइल पेमेंट कंपनियाँ ज़ोरदार धंधा कर रही हैं और ये बैंक नहीं हैं. ऐसे में सभी बैंकों पर दबाव है कि वो ग्राहक के मोबाइल पर अपनी जगह बनाएं.

सरकारी बैंकों पर इसकी भारी मार पड़ने का डर बढ़ता ही जा रहा है.

एयरलाइन और टेलीकॉम क्षेत्रों में ये देखा गया है कि प्राइवेट कंपनियों के आने से सरकारी कंपनियों को धंधे के लिए खासी मेहनत करनी पड़ रही है.

टेलीकॉम क्षेत्र में तो बीएसएनएल को पहली बार सालाना नुकसान की घोषणा करनी पड़ी थी और एमटीएनएल की हालत बद से बदतर होती जा रही है.

बैंकिंग में भी अब वैसा ही होने की बात की जा रही है. हाल ही में डीबीएस बैंक ने देश में ऑनलाइन बैंक बनाया है. ऐसे कई और बैंक भी बन सकते हैं.

घर या आफिस के पास वाले बैंक को लोग बीसियों साल तक नहीं बदलते हैं, नया अकाउंट खोलना भी मुश्किल ही रहा है. लेकिन दो सिम वाले स्मार्टफोन की मदद से कोई भी एक फ़ोन से कई खाते ऑपरेट कर सकता है.

इससे बैंकों के धंधे में जो स्थायित्व था, वो ख़त्म होगा और ग्राहकों की छीना-झपटी शुरू होगी. इसमें जो बैंक पिछड़ेंगे वे सिमट जाएँगे.

इलेक्ट्रॉनिक क्लीयरिंग से होने वाले पेमेंट की वैल्यू पहले ही पेपर चेक से होने वाले क्लीयरिंग की वैल्यू से ज़्यादा हो गई है.

नेफ्ट जैसे ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम हर साल 50 फीसदी की रफ़्तार से बढ़ रहे हैं. बैंक को चेक से जुड़ा काम कम करते हुए मोबाइल बैंकिंग पर ध्यान देना होगा. यदि वो नहीं बदले तो बैंक बंद होने की कगार पर आ जाएंगे.

प्राइवेट बैंकों के काम करने का तरीका भी बदल रहा है. क्रेडिट कार्ड को मशीन में स्वाइप करके पैसे देने का तरीका बदल रहा है और एंड्राइड पे, एप्पल पे और मोबाइल पेमेंट के नए तरीके जल्दी ही आने वाले हैं.

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इससे बैंकों के दुकानों में लगाए हुए पेमेंट टर्मिनल की ज़रुरत नहीं होगी. स्मार्टफ़ोन-टू-स्मार्टफ़ोन पेमेंट हो जाएगा.

करीब 15 साल पहले 27 सरकारी बैंकों के पास पूरे बैंकिंग क्षेत्र का 90 फीसदी धंधा था. अब ये घटकर करीब 70 फीसदी हो गया है, यानी सरकारी बैंकों के हाथ में मिलने वाला धंधा कम हो रहा है.

शेयर की कीमतों पर अगर नज़र डालें तो अकेले एचडीएफसी बैंक सभी सरकारी बैंकों के वैल्यू के बराबर है और सिर्फ स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की वैल्यू बाकी सभी सरकारी बैंकों के जितनी है.

ढेर सारी ब्रांच वाले सरकारी बैंकों के पास जाने वाले लोग अब बड़ी संख्या में मोबाइल का सहारा ले रहे हैं.

देश में 35 करोड़ से ज़्यादा लोगों के पास अब मोबाइल इंटरनेट है. चीन के बाद मोबाइल इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों में भारत दूसरे स्थान पर है. जैसे-जैसे 4जी देश के कोने कोने तक फैलेगी, स्मार्टफोन के ज़रिये लोगों के लिए बैंकिंग और भी आसान हो जाएगी.

साल 2015 में सभी सरकारी बैंकों की 80,000 से ज़्यादा शाखाओं में काम करने वाले 8.5 लाख कर्मचारी थे. लेकिन मोबाइल पर बैंकिंग का काम चलाने वाली कंपनियों में सिर्फ कुछ हज़ार लोगों से काम चल जाएगा, क्योंकि तरह-तरह की इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट के लिए किसी भी कर्मचारी की ज़रुरत नहीं होगी.

सिर्फ बैंक की ब्रांच, घर या ऑफिस के पास होने से बैंकों को धंधा मिलने की अब कोई भी गारंटी नहीं होगी.

आपके लिए भी इसका मतलब साफ़ है. जल्दी ही किसी को भी पैसे देने के लिए नोट या चेक की नहीं, स्मार्टफोन की ज़रुरत होगी.

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